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Vishwa Jagriti मिशन हम भारतीयों का दुरभाग्य यह है की हम भाग्यवादी हैं ! है भगवान भले ही छोटा मकान दो मगर वहाँ स्वर्ग का टुकडा हो और शान्ती हो !
हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी पर पाठकों की भरपूर टिप्पणियाँ प्राप्त हुईं। इस से इस विषय की व्यापकता और सामयिकता तो सिद्ध हो ही गई। साथ ही इस बात को भी समर्थन मिला कि लिपि और शब्द चयन के भिन्न स्रोतों के चलते भी आम हिन्दुस्तानी ने शब्द चयन की स्वतंत्रता का त्याग नहीं किया है। उस की भाषा में नए शब्द आते रहे, और शामिल होते रहे। नए शब्द आज भी आ रहे हैं...
सुप्रीमकोर्ट ने अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन वापस लेने के जम्मू-कश्मीर सरकार के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने अधिकारियों को इस मुद्दे पर राज्य में जारी हिंसक विरोध प्रदर्शनों में फंसे श्रद्धालुओं को समुचित सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया। न्यायाधीश अल्तमस कबीर और न्यायाधीश जी एस सिंघवी की पीठ ने कहा कि हम कै...
यु वावस्था अर्थात जवानी बड़ी अनमोल होती है और बुजुर्ग इसे संभालकर रखने की बात कहते हैं। यहां तक की यौवन को धन संपत्ति जितना ही मूल्यवान माना जाता है और नसीहत दी जाती है कि जिस तरह धन की सार संभाल की जाती है वैसे ही यौवन को भी संजो कर रखना चाहिए क्योकि चार दिन की चांदनी , फिर अंधेरी रात । मगर संत महात्मा इसे निस्सार भी बताते हैं और कहते हैं कि मनुश्...
जगत में जो भी मूल्यवान है- जीवन, प्रेम या सौंदर्य- उसका आविष्कार स्वयं करना पड़ता है। उसे किसी ओर से पाने का कोई उपाय नहीं है। एक अद्भुत वार्ता का मुझे स्मरण आता है। दूसरे महायुद्ध के समय मरे हुए, मरणासन्न, चोट खाये हुए सैनिकों से भरी हुई किसी खाई में दो मित्रों के बीच एक बातचीत हुई थी। उनमें से एक बिलकुल मृत्यु के द्वार पर है। वह जानता है कि वह मर...
ब्रह्मांड में जिन आइटमों को समझना बहुत मुश्किल है,उनमें से एक यह कि कुछ रेलगाड़ियों को अप क्यों कहा जाता है और कुछ को डाऊन क्यों कहा जाता है। एक सीनियर रेलवे वाले से पूछा, तो बोला, समझकर [...]...
आज ( 05 जुलाई 2008 ) कविता कोश की स्थापना के दो वर्ष पूरे हो गये हैं। अभी कुछ ही दिन पहले कोश ने दस हज़ार पन्नों के संकलन का आंकडा पार किया था। आज दूसरी वर्षगांठ के अवसर आपको यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि जून 2008 में कविता कोश जालस्थल ने एक महीने में दो लाख पन्नों के देखे जाने का आंकडा भी पार कर लिया। इसका अर्थ है कि अब हर महीने औसतन कविता को...
धुआँ और गुलाल ~~ डॊ.ऋषभदेव शर्मा सिर पर धरे धुएँ की गठरी मुँह पर मले गुलाल चले हम धोने रंज मलाल ! होली है पर्याय खुशी का खुलें और खिल जाएँ हम; होली है पर्याय नशे का - पिएँ और भर जाएँ हम; होली है पर्याय रंग का - रँगें और रंग जाएँ हम; होली है पर्याय प्रेम का - मिलें और खो जाएँ हम; होली है पर्याय क्षमा का - घुलें और धुल जाएँ गम ! मन के घाव सभी भर जाएँ...
इस तथ्य में सचाई नज़र कदापि आ रही है । कारण साफ़ है कि स्त्रियों के प्रति अब वो सुरक्षा सम्मान नहीं जैसा कि संस्कृति में कभी दिखाई देता रहा है । यदि साफ़ सुथरे शब्दों में कहा जाए तो अब नारी को अधिक शक्तिशाली होने की नितांत ज़रूरत है। बदलते परिवेश में बेहद लिजलिजापन झलक रहा है समाज में सामाजिक मूल्यों की गिरावट औरतों को सौंपी,अथवा मिली ज़बावदेही के...
पिछले कुछ दशकों से कई ऐसे मुद्दें हैं जो भारत और चीन दोनों के लिए सिरदर्द बने हुए हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों को अलग भी कर दे तो भी दोनों देशों के पास आन्तरिक मुद्दे कई हैं जिससे निजात पाने की जद्दोजहद में दोनों देश जूझ रहे हैं। मसलन, जनसँख्या वृद्धि, प्रदूषण सहित शहरों की ओर पलायन व शहरीकरण गंभीर मसला है। यह सच है की चीन ने अपने यहाँ शहरीकरण को एक...
जमाना सफेद हाथियों का है। हमरे खयाल इस निराली दुनिया के ऊ सबसे नायाब जीव हैं औरो महिमा ऐसन देखिए कि देश में आजकल ऊ काले हाथियों से बेसी पाए जाते हैं। काले हाथी भले लुप्तप्राय हो रहे हों, लेकिन सफेद हाथियों की हस्ती मिटाए नहीं मिटती। अपने देश में तो हालत कुछ ऐसन है कि कंपनियां पहिले सफेद हाथियों को नौकरी पर रखती है औरो फिर उन घोड़ों के बारे में सोचत...
दुनिया बहुते जालिम है। आप कुछो नहीं कीजिए, तो उसको पिराबलम, कुछो करने लगिए, तभियो पिराबलम! आखिर दुनिया को चाहिए का, कोयो नहीं जानता। औरो जब तक जानने की स्थिति में होता है, बरबाद हो चुका होता है। जब तक आम भारतीयों को दोनों टैम रोटी-नून नहीं मिलता था, गरीब देश कह-कहके पश्चिमी देशों ने उसके नाक में दम कर रख था। अब जाके स्थिति सुधरी औरो कुछ लोग भरपेट ख...
पहले हम बुढ़ापे से डरते थे, लेकिन अब बूढे़ होने को बेकरार हूं। दिल करता है, कल के बजाए आज बूढ़ा हो जाऊं, तो एक अदद ढंग की हसीना हमको भी मिल जाए। नहीं, हम बेवकूफ नहीं हूं। बूढ़ा हम इसलिए होना चाहता हूं, काहे कि बुढ़ापा अब बुढ़ापा रह नहीं गया है। जीवन के चौथेपन में अब एतना मौज आने लगी है कि वानप्रस्थ की बात अब किसी के दिमागे में नहीं घुसती। विश्वास न...
शाहरुख खान औरो अक्षय कुमार आजकल फिलिम से बेसी किरकेट में घुसकर चरचा बटोर रहे हैं। शाहरुख के हाथ में गेंद औरो अक्षय के हाथ में बल्ला... लोग कनफूजिया रहे हैं- कल तक तो पर्दे पर महाशय नचनिया बने घूम रहे थे, किरकेटर कब बन गए? अभी तक किसी टीम में खेलते तो नहीं देखा...। लोग हैरान हैं, तो किरकेटो कम हैरान नहीं है। ऊ ई तो जानता है कि आजकल दुनिया में कोयो अ...
छठे वेतन आयोग की सिफारिश आने से बाबू सब कुछ बेसिए खुश हो गए हैं। बड़का-बड़का झोला सिलाकर अब उनको इंतजार है, तो बस सरकार के वेतन आयोग की सिफारिश मान लेने का। हालांकि हमरे समझ में ई नहीं आ रहा कि जब जिंदगी का फटफटिया घूस वाले पेटरोल से मजा में चलिए रहा है, तो एतना सैलरी का ऊ करेंगे का? एक ठो बाबू मिल गए, 'हमने अपनी इस 'चिंता' से उनको अवगत...
हाकी की लुटिया डूब गई, लोग बहुते निराश हुए। पूरे देश में बस एके ठो आदमी है, जो तनियो ठो परेशान नहीं हुआ औरो ऊ हैं हाकी महासंघ के अध्यक्ष गिल साहब। हमने सोचा, चलो मातम की इस बेला में गिल साहब से हाकी के बारे में बतिया लिया जाए। हम पहुंचे गिल साहब के पास। हमने कहा, 'बधाई हो, आपने ऊ कर दिखाया, जो 80 साल में कोयो नहीं कर सका था?' ऊ बोले, 'ध...
देश को बजट मिल गया। सत्ता में बैठे नेताजी सब खुश हैं, उनके दोनों मंतरियों ने एकदम धांसू इलेक्शन वाला बजट पेश किया है, तो विपक्षी नेताओं की परेशानी ई है कि बजट का पोस्टमार्टम कर ऊ जनता को जो उसका सड़ा-गला पार्ट दिखा रहे हैं, उसको देखकर जनता को हार्ट अटैक नहीं हो रहा। एक ठो विपक्षी नेताजी मिले, बोले, 'पब्लिक निकम्मी हो गई है। लालू ने सब्जबाग दिखा...
लीजिए, सब बिक गए। का तेंडुलकर, का धोनी, का जयसूर्या, का पॉन्टिंग...सबकी औकात दो टके की हो गई। सरे बाजार सब नीलाम हो गए। कोयो शाहरुख का करमचारी बन गया, तो कोयो प्रीति जिंटा का गुलाम, कोयो विजय माल्या के बोतल में बंद हो गया, तो कोयो रिलायंस के राजस्व का हिस्सा बन गया। जो जेतना बड़ा तीसमार खां था, ओ ओतना महंगा बिका, तो सचिन के साथ 'गेम' हो गया...
ई गजब का रिवाज है। जो व्यक्ति दुनिया को लूटता है या फिर जिसको दुनिया नहीं लूट पाती, ऊ 'बेचारे' महबूबा के हाथों बुरी तरह लुटते हैं औरो अजीब देखिए कि लुट-लुटकर भी खुश रहते हैं। यानी महबूबा दुनिया की सबसे बड़ी लुटेरिन होती हैं या फिर आप इहो कह सकते हैं कि ऊ 'भाइयों' की 'भाई' होती हैं। इसलिए भैय्या, हम तो यही कहेंगे कि बढ़िया तो...
आजकल हर जगह किडनी का शोर है। कोयो किडनी बेचने वालों को गरिया रहा है, तो कोयो किडनी खरीदने वालों को। कोयो किडनी दान की वकालत कर रहा है, तो कोयो कानून आसान करने की बात, लेकिन दिक्कत ई है कि असली समस्या पर किसी का ध्याने नहीं जा रहा। दरअसल, किडनी सुनकर भले ही आपको अपना जिगर या जिगर का टुकड़ा याद आता हो, लेकिन हमरी स्थिति ई है कि किडनी का नाम सुनते ही ...
नीरज जोशी पहाड़ से लौट कर आये हैं और अपना दर्द विस्फोट पर सबसे बांट रहे हैं. गांव के ईर्द गिर्द सिरहाने और पांवों की ओर दो तीन किमी दूर तक छितरे उन सीढ़ीनुमा खेतों के बारे में इस बार अचानक मेरी दिलचस्पी बढ गई। खेतों को दूर दूर तक निहारते हुए यह प्रश्न मेरे जेहन में बार-बार कौंधा कि आखिर इस महाविस्तार में इतने सीढीनुमा खेत किसने बनाये होंगे? अब ये ख...
संजय तिवारी उदारीकरण और पर्यावरण के मुद्दों पर अपनी आवाज उठाते रहे हैं.हाल ही मैं उन्होने विस्फोट पत्रिका को प्रारम्भ किया है. उसी में वह पर्यावरणविद अनुपम मिश्रा जी के बारे में बता रहे हैं. वे लोकजीवन और लोकज्ञान के साधक हैं. अब न लोकजीवन की कोई परिधि या सीमा है और न ही लोकज्ञान की. इसलिए अनुपम मिश्र भी किसी सीमा या परिचय से बंधें हुए नहीं हैं. ...
मनीषा इस पितृसत्तात्मक मुल्क में यौवन की दहलीज पर कदम रखती लड़की का शब्द चित्र खींच रही हैं. अच्छे घरों की अच्छी लड़कियाँ विले पार्ले स्टेशन पर उतरते ही अच्छी लड़की का चोंगा सीढि़यों के नीचे छिपा कॉलेज और समंदर के सिम्त जाने वाली सड़क का रुख करतीं और शाम को घर लौटते हुए सीढि़यों के नीचे से चोंगा उठाती जाती...
ईस्वामी पिछ्ले एक दशक से अमरीका में रह रहे हैं. वहां के समाज को वह नजदीक से देखते आये हैं और उसको लेकर उनका एक नजरिया भी है. अमरीका के नारीवादी अन्दोलन के खतरों के प्रति सतर्क करते हुए वह भारत की स्त्रीयों को अमरीकी आन्दोलन का अन्धानुकरण न करने की सलाह दे रहे हैं. भारतीय स्त्रियों ने अपने लिये सोचने का ठेका पश्चिमी नारियों को दे द...
सुनील दीपक अभी अभी भारत यात्रा से लौटे हैं.पुरी (उड़ीसा) में जगन्नाथ मंदिर की यात्रा करते समय कुछ बातें उनके मन में आयी जिन्हे वह हमारे साथ बांट रहे हैं. वैसे व्यक्तिगत रूप में मेरे लिए धार्मिकता और मंदिर में जा कर पूजा करने में कोई विषेश सम्बंध नहीं क्योंकि मेरे लिए धार्मिकता अधिक आध्यात्मिक एवं अंतर्मुखी है. धर्म और आस्था पर बात करना मुझे...
"ये काग़ज़ की कश्ती वो बारिश का पानी’ लिखने वाले सुदर्शन फ़ाकिर नहीं रहे…उन्ही को श्रद्धांजली देते हुए युनुस उनकी कुछ चुनिदा नज्मों से परिचय करवा रहे हैं. सुदर्शन फाकिर जिंदगी भर गुमनाम रहे, वो उन शायरों में से नहीं थे जो टेलीविजन या रेडियो की दुनिया में छाए रहें।वो ज्यादा इंटरव्यू भी नहीं देते थे । ये विडंबन...
ज्ञानदत्त पाण्डेयजी नियमित लिखने वाले हैं। उनका ब्लाग उनकी मानसिक हलचल का आईना है। वे जहां कहीं जाते हैं , उनका कैमरा उनके साथ होता है। कल ‘डिटूर’ पर निकले तो दिहाड़ी मजूर दिखे। आप भी उनकी नजर से देखिये - जहां ये लोग इकठ्ठा होते हैं, वहां रेल की संकरी पुलिया है। सड़क भी ऊबड़ खाबड़ है। लिहाजा वाहन धीरे धीरे निकलता है वहां से। सड़क के दोनो ...
प्रत्यक्षा का आत्मालाप कमोबेश हर एक स्त्री और पुरुष का आत्मालाप हो सकता है.जरूरत है तो इसे अपने अंदर कुरेदने की. मैं प्रगतिशील कहलाने के लिये पश्चिमी कपड़े पहनूँ , गाड़ी चलाऊँ , सिगरेट शराब पियूँ , देर रात आवारागर्दी करूँ ऐसे स्टीरियोटाइप में नहीं फँसना चाहती । मैं ये सिर्फ तब ही करना चाहूँगी जब ये करना मेरी मर्जी में होगा , सिर्फ किसी और के बनाये ...
देश का बजट एक सालाना कार्यक्रम है इसी के बारे में अपने व्यंग्यात्मक लहज़े में शिवकुमार मिश्र पूरा का पूरा निबेंध छाप दे रहे हैं. उनका यह निबंध भारतीय आम बजट की खास खास बातों से परिचय कराता है. बजट प्रस्तुति के बाद पुतले जलाने, रास्ता रोकने और बंद करने के कार्यक्रमों के अलावा एक और कार्यक्रम होता है जिसे बजट के ‘टीवीय विमर्श’ के नाम से ...
चन्द्रभूषण या यानि चन्दू भाई हमेशा से ज्वलंत मुद्दों पर अपनी लेखनी चलाते रहे हैं. अब वह पतनशील और प्रगतिशील को अपने निजी अनुभव से तोल रहे हैं. जमूरे की तरह उछल-उछलकर बात-बात पर बोलने की मेरी आदत नहीं है, न ही किसी बहस में इसलिए शामिल होता हूं कि लाला लोग इस जगह पड़ी टीपें गिनें ताकि देर-सबेर दो पैसे का जुगाड़ हो। मेरे लिए कोई भी शब्द सिर्फ बौद्धि...
एक शहर - अमृता प्रीतम 1. अस्पताल के दरवाजे पर हक, सच, ईमान और कद्रें, जाने कितने ही लफ्ज़ बीमार पड़े हैं इक भीड़ सी इकट्ठी हो गयी है, जाने कौन नुस्खा लिखेगा जाने यह नुस्खा लग जायेगा, लेकिन अभी तो ऐसा लगता है इनके दिन पूरे हो गये… 2. इस शहर में एक घर घर कि जहां बेघर रहते हैं जिस दिन कोई मजदूरी नहीं मिलत...
ट्विटर बहुत ही तेजी से इंटरनेट पर लोकप्रिय हो रही माइक्रोब्लॉगिंग नेटवर्किंग सेवा है। इसके द्वारा आप लगातार हर समय अपनो मित्रों के संदेश प्राप्त भी कर सकते हैं और अपने संदेश भेज भी सकते हैं। ट्विटर के बारे में ज्यादा जानकारी आप आलोक जी के इस लेख से ले सकते हैं। यदि आपका ट्विटर पर खाता नहीं है तो आज ही बनायें और स्वंय ट्विटर की साइट पर जाकर इस...
दिल्ली में ब्लॉगकैंप की घोषणा जब अमित ने की तो उसी समय मन बना लिया था कि इस ब्लॉगकैंप में जरूर जाऊंगा। मगर शनिवार सुबह एक जरूरी मीटिंग निकल आयी। मीटिंग लम्बी हो रही थी और मेरा मन नैहरू प्लेस में माइक्रोसॉफ्ट के ऑफिस में चल रही ब्लॉगकैंप पर ही अटका था। किसी तरह मीटिंग समाप्त कर निकला तो ट्विटर पर अमित का संदेश था कि Blogging beyond English ...
यहां पेश है पिछले शनिवार को एनडीटीवी के कार्यक्रम ग्रेट इंडियन बाजार में मोबाइल ब्लॉगिंग पर प्रसारित एक रिपोर्ट। इसे मैंने अपने मोबाइल से ही रिकार्ड किया था इसीलिये क्लिप की क्वालिटी थोड़ा अच्छी नहीं है।...
गूगल के हिंदी से अंग्रेजी और अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद के औजार को पिटारा में जोड़ दिया गया है। आप किसी भी साइट पर हों, एक क्लिक से उसे हिंदी से अंग्रेजी अथवा अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद कर सकते हैं। आपको बस टूल मीनू में अनुवाद पर क्लिक कर अपना ऑप्शन चुनना है। आपने यदि किसी अनुच्छेद (पैरा) का अनुवाद करना है तो ...
मोबाइल ब्लॉगिंग पर एक खास रिपोर्ट देखिये आज शाम 5.30 पर NDTV इंडिया के कार्यक्रम ’ग्रेट इंडियन बाजार’ में। इसकी रिकार्डिंग कल की गयी। यह एक मजेदार अनुभव रहा। कार्यक्रम रात 12.30 पर दोहराया भी जायेगा।...
दो दिन पहले ज्ञानजी ने अपनी पोस्ट में लिखा- कल घोस्ट बस्टर जी ने मेरी पोस्ट पर टिप्पणी नहीं की। शायद नाराज हो गये। मेरा उन्हे नाराज करने या उनके विचारों से टकराने का कोई इरादा न था, न है। मैं तो एक सम्भावना पर सोच व्यक्त कर रहा था। पर उन्हें यह बुरा लगा हो [...]...
कृष्णबिहारी [आपने कॄष्णबिहारी का परिचय, इंटरव्यू और उनके बारे में गोविन्द उपाध्याय का लेख पढ़ा। अब आप अपने खुद के लेखन के बारे में बिहारीजी का आत्मकथ्य भी देखिये। ] ‘हंस’ अक्टूबर २००५ में प्रकाशित लम्बी कहानी ‘इंतज़ार’ और ‘जागरण’ की साहित्य वाषिर्की में प्रकाशित ‘सर्वप्रिया’ ने एक बार फिर हिन्दी के पा...
गोविंद उपाध्याय ठेलुहा,फुरसतिया [पिछली पोस्ट में कृष्ण बिहारी जी का इंटरव्यू पोस्ट किया था। यह इंटरव्यू शब्दांजलि पत्रिका के लिये लिया था जो कि अंतत: पत्रिकागति को प्राप्त हुई मतलब बंद हो गयी। बिहारीजी के बारे में मुझे हमारे मित्र गोविन्द उपाध्याय ने बताया था। उन दिनों बिहारी जी की आत्मकथा सागर के इस पार [...]...
[सारिका सक्सेना काफ़ी दिन तक शब्दांजलि पत्रिका चलाती रहीं। मैंने शब्दांजलि के लिये कुछ इंटरव्यू लिये थे। उनमें से एक चर्चित कथाकार कृष्णबिहारीजी का भी था। बिहारीजी का यह इंटरव्यू आपके लिये हम जस का तस पेश कर रहे हैं। लेख के अंत में उनसे जुड़े लेखों, कहानियों और गीतों की संबंधित कड़ियां दी गयी [...]...
पिछले माह जब हम लखनऊ गये थे तो श्रीलालशुक्ल जी और अखिलेशजी के अलावा कंचन और टंडनजी से भी मिले थे। कंचन का फोन नम्बर हमने लिया था और आदतन गुमा दिया था। किसी का फोन नम्बर, पता आदि लेते ही हम सबसे पहला काम यह करते हैं कि उसे इधर-उधर धर देते हैं। इधर-उधर [...]...
हमने जब पूछिये फ़ुरसतिया से यहां शुरू किया तो देबाशीष की उलाहना भरी मेल आई जिसका लब्बो-लुआब यह है कि हम निरंतर को निकालने के लिये कुछ नहीं कर रहे। निरंतर के कुछ अंक निकले। हम लोगों ने बड़ी मेहनत की। लेकिन उसकी निरंतरता बरकरार न रख सके। समय का अभाव और आर्थिक जुगाड़ की [...]...
दोस्तों की मदद से गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरित मानस नेट पर उपलब्ध कराई गयी है। नेट पर जो लोग इसे देखते हैं वे समझते हैं कि हम लोग मानस मर्मज्ञ हैं। कुछ-कुछ जिज्ञासायें करते रहते हैं। एक सुझाव यह भी आया है कि मानस का सरल भाषा में अर्थ भी उपलब्ध कराया जाता तो अच्छा रहता। पिछ्ले [...]...
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