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संघ में बहुत सक्रिय थे तो मां-बाप ने सोचा कि शादी करा दो, सब ठीक हो जाएगा और तब हमारी शादी हो गयी। राजस्थान के एक विधायक ने राजस्थान में बाल-विवाह के मसले पर एनडीटीवी को ये बाइट दी है। जाहिर है विधायकजी बाल-विवाह की सारी जिम्मवेवारी अपने मां-बाप और परिवार के लोगों पर थोपते हुए अपने को दूध का धुला बताना चाह रहे हैं। लेकिन विधायकजी से ये सवाल कौन करन...
रात के ढाई बज रहे है। छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर मे दमघोटू बदबू फैल रही है। शहर गहरी नीन्द से जाग उठा है। यह बदबू है डिस्टलरी की। रात का शैतान फिर से सक्रिय है। यह समझ नही आता कि यह देश आम लोगो का है या उन चन्द लोगो का जिन्होने आम लोगो का चैन छीन रखा है। एक डिस्टलरी से पूरे शहर विशेषकर बच्चो को परेशानी। कोई है जो सुन रहा है आम लोगो की गुहार? सेप्टि...
******पीपल की छाँव में कुछ पत्ते ****** पत्ते अक्सर टूट कर गिर जाते हैं या जला दिये जाते हैं जैसे दहेज लोभ में नारी॥ पत्ते अक्सर पूजे जाते हैं कभी बेल के, कभी पीपल के जैसे चुनाव में जनता॥ पत्ते अक्सर कुचले जाते हैं या छोड़े जाते है नियति पर जैसे गरीब का बचपन॥ पत्ते अकसर पत्ते नहीं रह जाते हैं जब जाते है सही हाथों में जैसे बचपन गुरू के हाथ॥ मेरी कलम ...
श क्कर के देशी रूप को आमतौर पर खांड़ के रूप में जाना जाता है। बेहद प्रचलित यह शब्द संस्कृत के खण्डः से बना है जिसका एक अर्थ है टुकड़ा, पिण्ड, ईख-गन्ना अथवा कच्ची चीनी । खंड या खांड़ आज करीब करीब सभी भारतीय भाषाओं मे इसी या इससे मिलते जुलते रूप में मौजूद है जैसे तमिल में कांटू । हालांकि तमिल ज़बान द्रविड़ भाषा परिवार से ताल्लुक रखती है। संस्कृत खंड...
देश के जाने माने गायक और संगीतविद पं फ़िरोज़ द्स्तूर का नौ मई को रात नौ बजे मुंबई में देहांत हो गया। 89 वर्ष के पं दस्तूर किराना घराने के रौशन चिराग़ थे। आज जब मेरे हारमोनियम वादक मित्र श्री सुधीर नाईक ने जब ये जानकारी मुम्बई से फ़ोन पर दी तो मन ने कहा कि किराना घराने की परम्परा का एक और गुणी साधक हमारे बीच से उठ गया। पं दस्तूर महान सवाई गंधर्व और उस्त...
हंसी-खेल में कहीं नस सरक जाये या पैर की उंगलियों के बीच जाने कहां से सरककर एक कंकड़ चला आये, छूटा-दबा रह जाये और अचानक गड़े ऐसे कि मुंह से कसकती एक कराह छूटे चटककर कहीं कुछ भीतर टूटे वैसे ही रहते-रहते जीवन समझ लेने की हकबकायी बेचैनियां समझ आती हैं जीवन कहां आता है? सूने दोपहर की सन सन बजती ख़ामोशी. तकिये पर ढीला गिरा इक चेहरा. प्यास व हहास की कुछ ...
न छपी है, न छपवाऊंगा पैसे दे कर मैं कभी किताब नहीं छपवाऊंगा न है शिल्प का ज्ञान न है छंद की पहचान फिर भी रोज नई नई रचना पेश करता जाउंगा पन्ना एक एक रोज भेज कर आपको झकझोड़ता जाऊंगा लेकिन पैसे दे कर मैं कभी किताब नहीं छपवाऊंगा न छपी है … छप गई किताब जो बिकी नहीं किताब तो पाठकों को प्रकाशकों को मैं कोसता ही जाऊँगा इसीलिए पैसे दे कर मैं कभी किताब नहीं छ...
मिमोह की संभावनाओं को जिम्मी ने रोका मिथुन चक्रवर्ती की की दूसरी परी का
मिथुन चक्रवर्ती के सुपुत्र मिमोह ‘जिमी’ नामक फिल्म में प्रस्तुत हो रहे हैं। नेताओं, सितारों और डॉक्टरों के पुत्र प्राय: अपने पिता के व्यवसाय में जाते हैं। डॉक्टरों को पढ़ाई करनी होती है और पिता के व्यवसाय में होने से उन्हें परीक्षा में कोई खास रियायत नहीं मिलती। नेता और सितारे अपनी औलादों को किसी तरह मैदान में ले ही आते हैं। आज मिमोह कल्पना नहीं कर...
मिथुन चक्रवर्ती के सुपुत्र मिमोह ‘जिमी’ नामक फिल्म में प्रस्तुत हो रहे हैं। नेताओं, सितारों और डॉक्टरों के पुत्र प्राय: अपने पिता के व्यवसाय में जाते हैं। डॉक्टरों को पढ़ाई करनी होती है और पिता के व्यवसाय में होने से उन्हें परीक्षा में कोई खास रियायत नहीं मिलती। नेता और सितारे अपनी औलादों को किसी तरह मैदान में ले ही आते हैं। आज मिमोह कल्पना नहीं कर...
संघ में बहुत सक्रिय थे तो मां-बाप ने सोचा कि शादी करा दो, सब ठीक हो जाएगा और तब हमारी शादी हो गयी। राजस्थान के एक विधायक ने राजस्थान में बाल-विवाह के मसले पर एनडीटीवी को ये बाइट दी है। जाहिर है विधायकजी बाल-विवाह की सारी जिम्मवेवारी अपने मां-बाप और परिवार के लोगों पर थोपते हुए अपने को दूध का धुला बताना चाह रहे हैं। लेकिन विधायकजी से ये सवाल कौन करन...
रात के ढाई बज रहे है। छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर मे दमघोटू बदबू फैल रही है। शहर गहरी नीन्द से जाग उठा है। यह बदबू है डिस्टलरी की। रात का शैतान फिर से सक्रिय है। यह समझ नही आता कि यह देश आम लोगो का है या उन चन्द लोगो का जिन्होने आम लोगो का चैन छीन रखा है। एक डिस्टलरी से पूरे शहर विशेषकर बच्चो को परेशानी। कोई है जो सुन रहा है आम लोगो की गुहार? सेप्टि...
******पीपल की छाँव में कुछ पत्ते ****** पत्ते अक्सर टूट कर गिर जाते हैं या जला दिये जाते हैं जैसे दहेज लोभ में नारी॥ पत्ते अक्सर पूजे जाते हैं कभी बेल के, कभी पीपल के जैसे चुनाव में जनता॥ पत्ते अक्सर कुचले जाते हैं या छोड़े जाते है नियति पर जैसे गरीब का बचपन॥ पत्ते अकसर पत्ते नहीं रह जाते हैं जब जाते है सही हाथों में जैसे बचपन गुरू के हाथ॥ मेरी कलम ...
श क्कर के देशी रूप को आमतौर पर खांड़ के रूप में जाना जाता है। बेहद प्रचलित यह शब्द संस्कृत के खण्डः से बना है जिसका एक अर्थ है टुकड़ा, पिण्ड, ईख-गन्ना अथवा कच्ची चीनी । खंड या खांड़ आज करीब करीब सभी भारतीय भाषाओं मे इसी या इससे मिलते जुलते रूप में मौजूद है जैसे तमिल में कांटू । हालांकि तमिल ज़बान द्रविड़ भाषा परिवार से ताल्लुक रखती है। संस्कृत खंड...
देश के जाने माने गायक और संगीतविद पं फ़िरोज़ द्स्तूर का नौ मई को रात नौ बजे मुंबई में देहांत हो गया। 89 वर्ष के पं दस्तूर किराना घराने के रौशन चिराग़ थे। आज जब मेरे हारमोनियम वादक मित्र श्री सुधीर नाईक ने जब ये जानकारी मुम्बई से फ़ोन पर दी तो मन ने कहा कि किराना घराने की परम्परा का एक और गुणी साधक हमारे बीच से उठ गया। पं दस्तूर महान सवाई गंधर्व और उस्त...
हंसी-खेल में कहीं नस सरक जाये या पैर की उंगलियों के बीच जाने कहां से सरककर एक कंकड़ चला आये, छूटा-दबा रह जाये और अचानक गड़े ऐसे कि मुंह से कसकती एक कराह छूटे चटककर कहीं कुछ भीतर टूटे वैसे ही रहते-रहते जीवन समझ लेने की हकबकायी बेचैनियां समझ आती हैं जीवन कहां आता है? सूने दोपहर की सन सन बजती ख़ामोशी. तकिये पर ढीला गिरा इक चेहरा. प्यास व हहास की कुछ ...
न छपी है, न छपवाऊंगा पैसे दे कर मैं कभी किताब नहीं छपवाऊंगा न है शिल्प का ज्ञान न है छंद की पहचान फिर भी रोज नई नई रचना पेश करता जाउंगा पन्ना एक एक रोज भेज कर आपको झकझोड़ता जाऊंगा लेकिन पैसे दे कर मैं कभी किताब नहीं छपवाऊंगा न छपी है … छप गई किताब जो बिकी नहीं किताब तो पाठकों को प्रकाशकों को मैं कोसता ही जाऊँगा इसीलिए पैसे दे कर मैं कभी किताब नहीं छ...
मिमोह की संभावनाओं को जिम्मी ने रोका मिथुन चक्रवर्ती की की दूसरी परी का
मिथुन चक्रवर्ती के सुपुत्र मिमोह ‘जिमी’ नामक फिल्म में प्रस्तुत हो रहे हैं। नेताओं, सितारों और डॉक्टरों के पुत्र प्राय: अपने पिता के व्यवसाय में जाते हैं। डॉक्टरों को पढ़ाई करनी होती है और पिता के व्यवसाय में होने से उन्हें परीक्षा में कोई खास रियायत नहीं मिलती। नेता और सितारे अपनी औलादों को किसी तरह मैदान में ले ही आते हैं। आज मिमोह कल्पना नहीं कर...
मिथुन चक्रवर्ती के सुपुत्र मिमोह ‘जिमी’ नामक फिल्म में प्रस्तुत हो रहे हैं। नेताओं, सितारों और डॉक्टरों के पुत्र प्राय: अपने पिता के व्यवसाय में जाते हैं। डॉक्टरों को पढ़ाई करनी होती है और पिता के व्यवसाय में होने से उन्हें परीक्षा में कोई खास रियायत नहीं मिलती। नेता और सितारे अपनी औलादों को किसी तरह मैदान में ले ही आते हैं। आज मिमोह कल्पना नहीं कर...
संजय तिवारी उदारीकरण और पर्यावरण के मुद्दों पर अपनी आवाज उठाते रहे हैं.हाल ही मैं उन्होने विस्फोट पत्रिका को प्रारम्भ किया है. उसी में वह पर्यावरणविद अनुपम मिश्रा जी के बारे में बता रहे हैं. वे लोकजीवन और लोकज्ञान के साधक हैं. अब न लोकजीवन की कोई परिधि या सीमा है और न ही लोकज्ञान की. इसलिए अनुपम मिश्र भी किसी सीमा या परिचय से बंधें हुए नहीं हैं. ...
मनीषा इस पितृसत्तात्मक मुल्क में यौवन की दहलीज पर कदम रखती लड़की का शब्द चित्र खींच रही हैं. अच्छे घरों की अच्छी लड़कियाँ विले पार्ले स्टेशन पर उतरते ही अच्छी लड़की का चोंगा सीढि़यों के नीचे छिपा कॉलेज और समंदर के सिम्त जाने वाली सड़क का रुख करतीं और शाम को घर लौटते हुए सीढि़यों के नीचे से चोंगा उठाती जाती...
ईस्वामी पिछ्ले एक दशक से अमरीका में रह रहे हैं. वहां के समाज को वह नजदीक से देखते आये हैं और उसको लेकर उनका एक नजरिया भी है. अमरीका के नारीवादी अन्दोलन के खतरों के प्रति सतर्क करते हुए वह भारत की स्त्रीयों को अमरीकी आन्दोलन का अन्धानुकरण न करने की सलाह दे रहे हैं. भारतीय स्त्रियों ने अपने लिये सोचने का ठेका पश्चिमी नारियों को दे द...
सुनील दीपक अभी अभी भारत यात्रा से लौटे हैं.पुरी (उड़ीसा) में जगन्नाथ मंदिर की यात्रा करते समय कुछ बातें उनके मन में आयी जिन्हे वह हमारे साथ बांट रहे हैं. वैसे व्यक्तिगत रूप में मेरे लिए धार्मिकता और मंदिर में जा कर पूजा करने में कोई विषेश सम्बंध नहीं क्योंकि मेरे लिए धार्मिकता अधिक आध्यात्मिक एवं अंतर्मुखी है. धर्म और आस्था पर बात करना मुझे...
"ये काग़ज़ की कश्ती वो बारिश का पानी’ लिखने वाले सुदर्शन फ़ाकिर नहीं रहे…उन्ही को श्रद्धांजली देते हुए युनुस उनकी कुछ चुनिदा नज्मों से परिचय करवा रहे हैं. सुदर्शन फाकिर जिंदगी भर गुमनाम रहे, वो उन शायरों में से नहीं थे जो टेलीविजन या रेडियो की दुनिया में छाए रहें।वो ज्यादा इंटरव्यू भी नहीं देते थे । ये विडंबन...
ज्ञानदत्त पाण्डेयजी नियमित लिखने वाले हैं। उनका ब्लाग उनकी मानसिक हलचल का आईना है। वे जहां कहीं जाते हैं , उनका कैमरा उनके साथ होता है। कल ‘डिटूर’ पर निकले तो दिहाड़ी मजूर दिखे। आप भी उनकी नजर से देखिये - जहां ये लोग इकठ्ठा होते हैं, वहां रेल की संकरी पुलिया है। सड़क भी ऊबड़ खाबड़ है। लिहाजा वाहन धीरे धीरे निकलता है वहां से। सड़क के दोनो ...
प्रत्यक्षा का आत्मालाप कमोबेश हर एक स्त्री और पुरुष का आत्मालाप हो सकता है.जरूरत है तो इसे अपने अंदर कुरेदने की. मैं प्रगतिशील कहलाने के लिये पश्चिमी कपड़े पहनूँ , गाड़ी चलाऊँ , सिगरेट शराब पियूँ , देर रात आवारागर्दी करूँ ऐसे स्टीरियोटाइप में नहीं फँसना चाहती । मैं ये सिर्फ तब ही करना चाहूँगी जब ये करना मेरी मर्जी में होगा , सिर्फ किसी और के बनाये ...
देश का बजट एक सालाना कार्यक्रम है इसी के बारे में अपने व्यंग्यात्मक लहज़े में शिवकुमार मिश्र पूरा का पूरा निबेंध छाप दे रहे हैं. उनका यह निबंध भारतीय आम बजट की खास खास बातों से परिचय कराता है. बजट प्रस्तुति के बाद पुतले जलाने, रास्ता रोकने और बंद करने के कार्यक्रमों के अलावा एक और कार्यक्रम होता है जिसे बजट के ‘टीवीय विमर्श’ के नाम से ...
चन्द्रभूषण या यानि चन्दू भाई हमेशा से ज्वलंत मुद्दों पर अपनी लेखनी चलाते रहे हैं. अब वह पतनशील और प्रगतिशील को अपने निजी अनुभव से तोल रहे हैं. जमूरे की तरह उछल-उछलकर बात-बात पर बोलने की मेरी आदत नहीं है, न ही किसी बहस में इसलिए शामिल होता हूं कि लाला लोग इस जगह पड़ी टीपें गिनें ताकि देर-सबेर दो पैसे का जुगाड़ हो। मेरे लिए कोई भी शब्द सिर्फ बौद्धि...
"चोखेर बाली" यानि "आंख की किरकिरी" में मनीषा अपनी पतित इच्छाओं के बारे में बता रही हैं .वो मानती हैं वो साइको हैं और शायद अकेली नहीं हैं. वैसे पतनशील होना ज्यादा आसान है और अच्छी लड़की बनने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। हो सकता है, मेरे जैसी और ढेरों लड़कियां हों, जो अपनी पतनशीलता को छिपाती फिरती हैं, अच्छ...
दुनिया बहुते जालिम है। आप कुछो नहीं कीजिए, तो उसको पिराबलम, कुछो करने लगिए, तभियो पिराबलम! आखिर दुनिया को चाहिए का, कोयो नहीं जानता। औरो जब तक जानने की स्थिति में होता है, बरबाद हो चुका होता है। जब तक आम भारतीयों को दोनों टैम रोटी-नून नहीं मिलता था, गरीब देश कह-कहके पश्चिमी देशों ने उसके नाक में दम कर रख था। अब जाके स्थिति सुधरी औरो कुछ लोग भरपेट ख...
पहले हम बुढ़ापे से डरते थे, लेकिन अब बूढे़ होने को बेकरार हूं। दिल करता है, कल के बजाए आज बूढ़ा हो जाऊं, तो एक अदद ढंग की हसीना हमको भी मिल जाए। नहीं, हम बेवकूफ नहीं हूं। बूढ़ा हम इसलिए होना चाहता हूं, काहे कि बुढ़ापा अब बुढ़ापा रह नहीं गया है। जीवन के चौथेपन में अब एतना मौज आने लगी है कि वानप्रस्थ की बात अब किसी के दिमागे में नहीं घुसती। विश्वास न...
शाहरुख खान औरो अक्षय कुमार आजकल फिलिम से बेसी किरकेट में घुसकर चरचा बटोर रहे हैं। शाहरुख के हाथ में गेंद औरो अक्षय के हाथ में बल्ला... लोग कनफूजिया रहे हैं- कल तक तो पर्दे पर महाशय नचनिया बने घूम रहे थे, किरकेटर कब बन गए? अभी तक किसी टीम में खेलते तो नहीं देखा...। लोग हैरान हैं, तो किरकेटो कम हैरान नहीं है। ऊ ई तो जानता है कि आजकल दुनिया में कोयो अ...
छठे वेतन आयोग की सिफारिश आने से बाबू सब कुछ बेसिए खुश हो गए हैं। बड़का-बड़का झोला सिलाकर अब उनको इंतजार है, तो बस सरकार के वेतन आयोग की सिफारिश मान लेने का। हालांकि हमरे समझ में ई नहीं आ रहा कि जब जिंदगी का फटफटिया घूस वाले पेटरोल से मजा में चलिए रहा है, तो एतना सैलरी का ऊ करेंगे का? एक ठो बाबू मिल गए, 'हमने अपनी इस 'चिंता' से उनको अवगत...
हाकी की लुटिया डूब गई, लोग बहुते निराश हुए। पूरे देश में बस एके ठो आदमी है, जो तनियो ठो परेशान नहीं हुआ औरो ऊ हैं हाकी महासंघ के अध्यक्ष गिल साहब। हमने सोचा, चलो मातम की इस बेला में गिल साहब से हाकी के बारे में बतिया लिया जाए। हम पहुंचे गिल साहब के पास। हमने कहा, 'बधाई हो, आपने ऊ कर दिखाया, जो 80 साल में कोयो नहीं कर सका था?' ऊ बोले, 'ध...
देश को बजट मिल गया। सत्ता में बैठे नेताजी सब खुश हैं, उनके दोनों मंतरियों ने एकदम धांसू इलेक्शन वाला बजट पेश किया है, तो विपक्षी नेताओं की परेशानी ई है कि बजट का पोस्टमार्टम कर ऊ जनता को जो उसका सड़ा-गला पार्ट दिखा रहे हैं, उसको देखकर जनता को हार्ट अटैक नहीं हो रहा। एक ठो विपक्षी नेताजी मिले, बोले, 'पब्लिक निकम्मी हो गई है। लालू ने सब्जबाग दिखा...
लीजिए, सब बिक गए। का तेंडुलकर, का धोनी, का जयसूर्या, का पॉन्टिंग...सबकी औकात दो टके की हो गई। सरे बाजार सब नीलाम हो गए। कोयो शाहरुख का करमचारी बन गया, तो कोयो प्रीति जिंटा का गुलाम, कोयो विजय माल्या के बोतल में बंद हो गया, तो कोयो रिलायंस के राजस्व का हिस्सा बन गया। जो जेतना बड़ा तीसमार खां था, ओ ओतना महंगा बिका, तो सचिन के साथ 'गेम' हो गया...
यहां पेश है पिछले शनिवार को एनडीटीवी के कार्यक्रम ग्रेट इंडियन बाजार में मोबाइल ब्लॉगिंग पर प्रसारित एक रिपोर्ट। इसे मैंने अपने मोबाइल से ही रिकार्ड किया था इसीलिये क्लिप की क्वालिटी थोड़ा अच्छी नहीं है।...
गूगल के हिंदी से अंग्रेजी और अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद के औजार को पिटारा में जोड़ दिया गया है। आप किसी भी साइट पर हों, एक क्लिक से उसे हिंदी से अंग्रेजी अथवा अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद कर सकते हैं। आपको बस टूल मीनू में अनुवाद पर क्लिक कर अपना ऑप्शन चुनना है। आपने यदि किसी अनुच्छेद (पैरा) का अनुवाद करना है तो ...
मोबाइल ब्लॉगिंग पर एक खास रिपोर्ट देखिये आज शाम 5.30 पर NDTV इंडिया के कार्यक्रम ’ग्रेट इंडियन बाजार’ में। इसकी रिकार्डिंग कल की गयी। यह एक मजेदार अनुभव रहा। कार्यक्रम रात 12.30 पर दोहराया भी जायेगा।...
आज कल के मुकाबले दिल्ली मेँ गर्मी कम है फिर भी पसीने आ रहे हैँ।
गूगल बाबा हिंदी से अंग्रेजी और अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद का औजार ले कर आये हैं। इसकी सूचना अनुनाद जी ने चिट्ठकार समूह पर दी। गूगल ने इस तरह की सुविधा शुरू की यह बहुत बड़ी बात है, बहुत सी कमियां हैं पर उम्मीद है मशीनी अनुवाद धीरे धीरे सुधार लिया जा सकेगा। यदि यह सफल होता है तो सोचिये इंटरनेट के करोड़ों अंग्रेजी पृष्ठ हिंदी पढ़ने वालों को उपलब्ध हो सके...
पूजनीय बड़े भैया, प्रणाम, आज फिर से एक बार आपको खत लिख रहे हैं। हम सुने कि आपहूं अपना बिलाग शुरू किये हैं। हमका बड़ी खुशी हुई। हम आपकी आज तक ऐको फिलम नहीं छोड़े हैं। टेलीबिजन पर सारे इंटरब्यू देखे हैं। पर सब हिंदी में। आप हमार उत्तर परदेस में जन्मे। हिंदी के संस्कार मिले। हिंदी में सारी जिंदगी काम किया। “कौ...
काफ़ी दिन से मैं अपने शहर कानपुर के बारे में लिखने की सोच रहा हूं। बचपन से इस शहर में रहा, पला, बढ़ा और आज संयोग कि रोजी-रोटी के लिये इसी शहर में नौकरी कर रहा हूं। कानपुर के बारे में नेट पर जानकारी है लेकिन जितनी है या और जो होगी जिसका मुझे पता [...]...
कल पाण्डेयजी ने सांड़ के बारे में लिखा। इस पर द्विवेदीजी की टिप्पणी भी आई। हम कल टिपिया न पाये सो सोचा अपने ब्लाग पर लिख मारें। दो साल पहले मैंने सांड़ के बहाने कुछ हायकू लिखे थे। फिर से देखिये- दौड़ता हुआ सांड़, सांड़ ही तो है नही -दूसरा. सिद्ध है सिद्ध देख रहा है गिद्ध नहीं [...]...
मेरी प्यारी, बहुत दिन हुये तुमको खत न लिखा। आज मन किया। सोचा तुमको खत लिखा जाये। वैसे लोग कहते हैं कि खत लिखने का जमाना चला गया। क्या ऐसा है? मुझे यह लोगों की फ़ैलायी गयी अफ़वाह लगती है। जो कर नहीं पाते उसी के लिये उड़ा दिया कि उसका जमाना चला गया। ऐसा होता [...]...
आज अभी कुछ देर पहले प्रत्यक्षाजी की मेल मिली। दुखद समाचार था। उनके पापा एक लम्बी बीमारी के बाद नहीं रहे। उनके पापाजी पिछले साल से लगातार किसी न किसी बीमारी से परेशान थे। अंतत: वे 27 अप्रैल की रात को दुनिया से विदा हो गये। अपने पापा के बारे में प्रत्यक्षाजी ने लिखते हुये [...]...
पिछले दिनों कुछ पोस्टें पढ़ीं। सोचने पर मजबूर हो गये। संयोग यह कि इन सभी पोस्टों का संबंध किसी ने किसी तरह इलाहाबाद से है। सबसे पहले ज्ञानजी की दोषारोपण तालिका देखी। मन दुखी हुआ। मैंने टिपियाया भी- मुझे लगता है जो कारण आपने गिनाये वे आपके दुख के कारण नहीं हैं। बड़ा दुख [...]...
ये शीर्षक मुझे मजबूरी में लिखना पड़ रहा है। लिखना दर असल चाहता था -तेरी तो ऐसी तैसी आलोक पुराणिक। लेकिन हुआ क्या आज सबेरे से आलोक पुराणिक का ब्लाग खुल नहीं रहा था। सो सोचा पाठक को क्यों भरमाया जाये। सच ही बताया जाये। बताते चलें कि यह शीर्षक आलोक पुराणिक जी ने [...]...
Filed under: iTS, Education, PodcastsHot for Hindi? Up for learning Uyghur? Wild about Welsh? LifeClever tipped us off to the fact that there are 926 free language training podcasts currently availabl...
We have recently spent some time updating our Foreign Language Lesson Podcast Collection. And, along the way, one thing became clear. During the past six months, the number of podcasts offering free l...
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I was just browsing iTunes for poignant Morrissey covers when I discovered nearly a thousand free language courses on iTunes. 926 courses to be exact. Holy Moleskine, Batman! The extensive library of...
GIRLS ALOUD - Something Kinda Ooooh (Remixes) April 28th, 2008 GIRLS ALOUD The Girls transact their torrefy strange distinguish in virtue of Ant and Dec's Saturday Darkness Takeaway! The chorin...
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